Saturday, 15 September, 2007

पैसे की जंग में खेल का सत्यानाश

वर्ल्ड कप मे भारतीय टीम की शर्मनाक हार के बाद जब जी समूह के अध्यक्ष ने ऍक नई इडियन किर्केट लीग की स्थापना की है, तब से बीसीसीआई और लीग के बीच विवाद खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है।दोनों के टकराव बढते ही जा रहे है।
ऍक तरफ बीसीसीआई दुनिया की सबसे अमीर संस्था है पर यहां राजनीति मे ध्यान ज्यादा ,पैसे को अधिक से अधिक इकठ्ठा करना तथा खेल की तरफ कोई ध्यान न देना। हद तो तब हो गई जब भारतीय टीम वर्ल्ड कप से हारकर लौटी तो कोई हार की जिम्मेदारी लेने भी सामने नहीं आया ।और तो और बीसीसीआई के अध्यक्ष शरद पवार जो कृषि मंत्री है,इस खेल के लिऍ ऍक हफ्ते में सिर्फ आधे घंटे का समय देते है।
सिर्फ अध्यक्ष जी ही नहीं बल्कि इस बोर्ड में विभिन्न पदों पर आसीन अधिकारी भी अनेक विभागों से जुङे हैं जिन्हें अपनी जिंदगी में शायद ही कभी किर्केट का बल्ला या गेंद थामी हो। किर्केट का इससे बुरा हाल तो शायद ही किसी देश में हो।
जी समूह के अध्यक्ष ने आईसीऍल की स्थापना करने की घोषणा की और कहा कि इस लीग में नऍ युवा चेहरों को पर्शिक्षण दिया जाऍगा और अच्छी से अच्छी सुविधाऍं उपलब्ध कराई जाऍगी। इस लीग में कपिल देव ,किरन मोरे व संदीप पाटिल सरीखे पूर्व सितारों को पर्शिक्षण के लिऍ जोडा गया हैं।
लीग के आने से बीसीसीआई को यह लग रहा है कि यह उसके लिऍ चुनौती है। भारतीय किर्केट की जैसी वर्तमान स्थिति है उसे अगर कोई बेहतर करने की कोशिश करें तो इसमें बुराई क्या है? कहीं बीसीसीआई को अब यह अहसास तो नहीं हुआ है कि उसे भी किर्केट के बारे में सोचना चाहिऍ । पर जो अब तक नही सोचा, अब क्या सोचेंगें ? वहां तो सिर्फ पैसे की बात की जाती है कि कहां से ज्यादा से पैसा आऍ और पदाधिकारियों द्वारा अपनी जेबें भरी जाऍ। जैसा कि वर्ल्ड कप की हार के बाद बोर्ड के द्वारा बयान दिया गया कि घरेलू पिचों की स्थिति ठीक करेंगें ।बीसीसीआई को यह डर भी सता रहा है कहीं उनकी कमाई पर तो फर्क नहीं पङेगा।
बीसीसीआई को यह भी डर सता रहा है कि वर्ल्ड कप की हार के बाद जो विग्यापन उनके परायोजकों ने वापस ले लिऍ थे वे कहीं लीग के पास न चले जाऍ और लीग बङे तौर पर न उभर आऍ। इससे दुनिया भर में सबसे अमीर बोर्ड होने का दंभ भरने विली बीसीसीआई की स्थिति पतली न पङ जाऍ ।और उसकी छवि दुनिया के सामने धूमिल न हो जाऍ।
लीग ने अपने साथ जो पूर्व खिलाङियों को पृशिक्षण के लिऍ जोङा है बीसीसीआई अब उन पर भी तरह-तरह के दबाव डाल रहा है।इसका सबसे पहला निशाना अकेले विश्व कप के अकेले विश्व विजेता कप्तान कपिल देव को बनाया है। बोर्ड ने उन्हें धमकी तक दे डाली कि वे राष्टत्र्ीय किर्केट अकादमी के अध्यक्ष रहते हुऍ इस लीग से नहीं जुङ सकते हैं।
बोर्ड ने सभी किर्केटरों को भी यह बात कह डाली कि अगर कोई लीग से कीसी भी पर्कार से जुङता है तो उसका बीसीसीआई में कोई रोल नहीं होगा।न ही उन्हें बीसीसीआई द्वारा कोई पेंशन दीजाऍगी। अगर किसी ने बोर्ड की यह बात नहीं तो बोर्ड उन पर कार्रवाई करेगा।
पूर्व विकेट कीपर व चयनकर्ता किरन मोरे भी लीग से जुङे हैं पर उन्होंने इससे पहले बङौदा किर्केट संघ के पद से इस्तीफा दिया। पूर्व खिलाङी संदीप पाटिल को भी लीग का कोच बनाया गया। अब इन सभी को पेंशन छीनने की धमकी दी जा रही है ।क्या पेंशन छीनने से ये पूर्व खिलाङी इस लीग से हट जाऍंगें?
पेंशन मामले में आखिर पूर्व भारतीय कप्तान कपील देव ने मोर्चा संभाला और बीसीसीआई को दो टूक शब्दों में कहा कि 'उनकी किसी से लङाई नहीं है और उन्हें केवल किर्केट से ही प्यार है ।मेरी समझ बहुत साफ है।मै अपने जीवन की बेहतरी के लिऍ ,अपने और अपने परिवार के लिऍ काम करता हूं।
मुझे किर्केट से जो मिला है उसे मैंखेल को लओटाना चाहता हूं।जिस काम के लिऍ मुझे भुगतान किया गया है वह मै कर रहा हूं ।कोई संस्था मुझे अपना काम करने से नहीं रोक सकती है तो यह उसके लिऍ अनुचित कदम होगा।मैं उनसे पेंशन मांगने तो नहीं गया था,अगर वे रोकना चाहें तो मैं क्या कर सकता हूं।वे चाहें तो इसे रोक दें।
बीसीसीआई और इंडियन किर्केट लीग की आपसी जंग से खेल का पता नहीं कितना फायदा होगा परंतु इतना जरुर तय है कि निकट भविष्य में ये आग जरुर भङकेगी और ऍसे में भारतीय किर्केट से उम्मीद न लगाई जाऍ तो ही बेहतर है।

(यह लेख धर्मयुध्द नामक पत्रिका में अगस्त रिलीज के पृष्ट २५ पर छपा है)

Saturday, 25 August, 2007

जीना यहां है

शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?

जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है ?


पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िक्र है भूल गये भीगते हुए टहलना क्या है?
सीरियल्स् के किर्दारों का सारा हाल है मालूम
पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुर्सत कहाँ है?


अब रेत पे नंगे पाँव टहलते क्यूं नहीं?

108 हैं चैनल् फ़िर दिल बहलते क्यूं नहीं?


इन्टरनैट से दुनिया के तो टच में हैं,

लेकिन पडोस में कौन रहता है जानते तक नहीं.


मोबाइल, लैन्डलाइन सब की भरमार है,

लेकिन जिग्ररी दोस्त तक पहुँचे ऐसे तार कहाँ हैं?


कब डूबते हुए सुरज को देखा त , याद है?

कब जाना था शाम का गुज़रना क्या है?


तो दोस्तों शहर की इस दौड़ में दौड़् के करना क्या है

जब् यही जीना है तो फ़िर मरना क्या है?

Wednesday, 18 July, 2007

उसकी याद में

पल पल कट रहा है,
ऎक जमाने की तरह,
सोचने पर उसके बारे में आखें फूट पङती है,
नदियों की तरह।

आखिर क्यूं बसाऍ उन्होंने हमारी आखों में सपने,
जब उन्होंने समझा ही नहीं अपना।
हमने पूछा भी था,
कि इन सपनों की कोई तो वजह होगी,
तब उन्होंनें कहा ,
कि आपकी जिंदगी में इन सबकी जगह होगी।

हम तो अपने वादों पर टिके रहे ,
वो भी हमें दिलासे देते रहे।
हमने तो सोच लिया था ,
उनके साथ है जीना।
पर क्या पता था ,
जिसे हमने चाहा वही है बैगाना।

Wednesday, 11 July, 2007

क्या करुं

दिन रात मै सोचा करता हू,
ऍक खवाब सा देखा करता हूं,
जानता हू वो बस मे नही है।
फिर भी उसे पूजा करता हूं,
ऍक घुटन सी दिल मे रहती है।
बेवजह मै रोया करता हूं,
काश उसे मै कह भी सकूं,
कि मै तुमको चाहा करता हूं।


ये मेरी पहली कविता है,कृपया प्यार दें।